Wednesday, September 24, 2014

ग़ज़ल 06

जो सहीफ़ों* का लिखा हो जाएगा ।
तो ज़माने का भला हो जाएगा ।।
साथ देगा जब किसी छोटे का तू ।
बस उसी दम तू बड़ा हो जाएगा ।।
ये नहीं सोचा था कल मैंने कि तू ।
बे सबब मुझसे जुदा हो जाएगा ।।
बात तो कुछ भी न थी बे बात ही ।
मुझसे तू इतना ख़फ़ा हो जाएगा ।।
दौरे – गर्दिश मे मुझे मालूम है ।
यार तू भी बे वफ़ा हो जाएगा ।।
तेरी रहमत जो रही तो वक़्त का ।
हर निशाना फिर ख़ता हो जाएगा ।।
सच कहा तो मार ही देगा न तू ।
और इसके सिवा हो जाएगा ।।
कर भला तू काम कोई भी असर ।
तेरे हक़ मे वो दुआ हो जाएगा ।।

*सहीफ़ों – धर्म ग्रंथों

© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ खास, नई दिल्ली 

Wednesday, September 3, 2014

ग़ज़ल 05


मुझको आवाज़ देकर जगाता है वो।
रहगुज़र* पुरखतर* है बताता है वो।।
ऐसा रिश्ता मेरे उसके है दरमियाँ।
जो मैं ज़िद भी करूँ मान जाता है वो।।
भूखा सो जाऊँ मैं तो उठाकर मुझे।
अपने हाथों से खाना खिलाता है वो।।
बाँध पाया न कुछ उस सफर के लिए।
हौसला मेरा फिर भी बढाता है वो।।
मेरे घर भेजता है कभी रहमतें।
और कभी अपने दर पर बुलाता है वो।।
मैं तो मतलब निकलते ही भूला उसे।
राह माकूल* फिर भी दिखता है  वो।।
रंग सपनों के उड़ने लगें जब ‘असर’।
मेरे सपनों को खुद ही सजाता है वो।।

*रहगुज़र - रास्ता, 
पुरखतर - खतरों से भरा 
माकूल - उचित  
© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ खास, नई दिल्ली 

Tuesday, August 26, 2014

ग़ज़ल 04

कर रहे हैं हम अलल* एलान सब।
है अता कर्दा* तेरा अहसान सब।।
कुछ गलतफहमी न दिल में पाल तू।
है उसी के दम से तेरी शान सब।।
कोशिशें मत छोड़ पहले जाँच ले।
अपने गिर्दो-पेश* के इम्कान* सब।।
तिश्नगी* सहरा की बढ़ती जाए यूँ।
खत्म हो जाएँगे नखलिस्तान सब।।
ऐशो – इशरत की तलब जिनकी बढ़ी।
बेचते फिरते हैं वो ईमान सब।।
आदमी मत खेल तू बारूद से।
छोटे पड़ जाएँगे ये शमशान सब।।
सुन ‘असर’ मालिक तो बस वो एक है।
चार दिन के हैं यहाँ मेहमान सब।।


अलल – खुल्लम-खुल्ला, अता कर्दा – दिया हुआ, 
गिर्दो-पेश – हर-तरफ, इम्कान - संभावनाएँ, 
तिश्नगी – प्यास 
© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ ख़ास, नई दिल्ली

Friday, August 22, 2014

ग़ज़ल 03

साथ रहकर मेरे शादमाँ कुछ नहीं ǀ
लाख पूछूं वो करता बयाँ कुछ नहीं ǀǀ
आपसी रिश्ते से, डर से, लालच से या ǀ
सच जो कह न सके वो ज़ुबां कुछ नहीं ǀǀ
जो भी जैसा करे पाए वैसा सिला ǀ
सब तेरे सामने है निहाँ कुछ नहीं ǀǀ
काम आए न गर्दिश में बच्चों के जो ǀ
कहना पड़ता है दुःख से वो माँ कुछ नहीं ǀǀ
जो रियाया के दुःख से रहे बेख़बर ǀ
मेरा दावा है वो हुक्मरां कुछ नहीं ǀǀ
आए दर पर सवाली जो उम्मीद ले ǀ
जाए मायूस तो आस्तां कुछ नहीं ǀǀ
मेहनतें चाहे जितनी करे वो ‘असर’ ǀ
जो चमन उजड़ा तो बागबां कुछ नहीं ǀǀ

© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ ख़ास, नई दिल्ली

Monday, August 18, 2014

ग़ज़ल 02

अक्ल आ जाएगी ठिकाने पर
वो जो उतरेगा आज़माने पर
तीर दुनिया ने ताक़ कर मारे
हम ही आये नहीं निशाने पर
वो ही मेरा ख्याल रखता है
सारी दुनिया के भूल जाने पर
हस्ती शाहों की मिट ही जाती है
इक फ़क़त उसके रूठ जाने पर
डूबी कश्ती भी आ लगे साहिल
वो उतर आये जो बचाने पर
तू चला आएगा सदा पे मेरी
मैं फ़िदा तेरे इस बहाने पर
मैंने आवाज़ दी मैं रोया भी
तुम न आये मेरे बुलाने पर
राह जनमों से तक रहा है ‘असर’
अब तो आ जा गरीबखाने पर 

प्रमोद शर्मा 'असर'
हौजखास, नई दिल्ली 

Friday, August 15, 2014

गज़ल 01

पनपती ही जाये उदासी ज़मीं पर
ये फैली है क्यूँ बदहवासी ज़मीं पर
यहाँ भाई का भाई दुश्मन हुआ है
सबब कुछ नहीं बस ज़रा सी ज़मीं पर
अगर फैंके खाना उन्हें देख जिनको
मय्यसर नहीं झूठा, बासी ज़मीं पर
खता तूने कैसी बसर कर दी जिससे
बरसता नहीं अब्र प्यासी ज़मीं पर
औरत को देवी बताते तो हो तुम
बना कर रखो घर की दासी ज़मीं पर
हुई रौशनी तेरे घर मैं ‘असर’ जब
उतर आयी बेटी दुआ सी ज़मीं पर  

रचनाकार : प्रमोद शर्मा 'असर'
हौज़खास, नई दिल्ली 
फोन नंबर- 09910492264