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Monday, March 23, 2015

ग़ज़ल 07

फिरेंगे दर बदर सोचा नहीं था।।
मैं निकला था अकेले ही सफ़र पर।
मिलेगा हमसफ़र सोचा नहीं था।।
न उसने कद्र की माँ बाप तक की।
गिरेगा इस कदर सोचा नहीं था।।
पता था उम्र काट जायेगी तुझ बिन।
कटेगी यूँ मगर सोचा नहीं था।।
अता करके मुझे वो अपनी रहमत।
करेगा मोतबर सोचा नहीं था।।
'असर' यूँ छोड़ देगा राह में तू।
कभी ए राहबर सोचा नहीं था।।
प्रमोद शर्मा 'असर'
नई दिल्ली, भारत 

Wednesday, September 3, 2014

ग़ज़ल 05


मुझको आवाज़ देकर जगाता है वो।
रहगुज़र* पुरखतर* है बताता है वो।।
ऐसा रिश्ता मेरे उसके है दरमियाँ।
जो मैं ज़िद भी करूँ मान जाता है वो।।
भूखा सो जाऊँ मैं तो उठाकर मुझे।
अपने हाथों से खाना खिलाता है वो।।
बाँध पाया न कुछ उस सफर के लिए।
हौसला मेरा फिर भी बढाता है वो।।
मेरे घर भेजता है कभी रहमतें।
और कभी अपने दर पर बुलाता है वो।।
मैं तो मतलब निकलते ही भूला उसे।
राह माकूल* फिर भी दिखता है  वो।।
रंग सपनों के उड़ने लगें जब ‘असर’।
मेरे सपनों को खुद ही सजाता है वो।।

*रहगुज़र - रास्ता, 
पुरखतर - खतरों से भरा 
माकूल - उचित  
© प्रमोद शर्मा ‘असर’
हौज़ खास, नई दिल्ली