Tuesday, April 14, 2015

'नो कमेंट' पर अपना कमेंट


दोस्तो अभी-अभी सुमित प्रताप सिंह की नयी पुस्तक 'नो कमेंट' पढ़ कर ख़त्म की है। पुस्तक ने दिमाग़ को झकझोर कर रख दिया है। इतनी छोटी सी उम्र में किसी को ज़िन्दगी का इतना अनुभव कैसे हो सकता है? मेरे मतानुसार व्यंग्य साहित्य की सबसे मुश्किल विधाओं में से एक है पर सुमित की लेखनी में वो प्रवाह है कि लगता है कि व्यंग्य लिखना बहुत आसान होता होगा। इतनी आसानी से समाज की हर विसंगति पर इतनी सटीक चोट की है कि संवेदनशील व्यक्ति तिलमिला उठता है। यही व्यंग्य की सार्थकता है। उम्मीद की एक नयी किरण नज़र आ रही है। व्यंग्य का भविष्य मज़बूत और क़ाबिल हाथों में है।
इतनी अच्छी पुस्तक के लिए बधाई सुमित और एक और नयी पुस्तक के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ।

प्रमोद शर्मा 'असर'

हौज़ ख़ास, नई दिल्ली

Monday, March 23, 2015

ग़ज़ल 07

फिरेंगे दर बदर सोचा नहीं था।।
मैं निकला था अकेले ही सफ़र पर।
मिलेगा हमसफ़र सोचा नहीं था।।
न उसने कद्र की माँ बाप तक की।
गिरेगा इस कदर सोचा नहीं था।।
पता था उम्र काट जायेगी तुझ बिन।
कटेगी यूँ मगर सोचा नहीं था।।
अता करके मुझे वो अपनी रहमत।
करेगा मोतबर सोचा नहीं था।।
'असर' यूँ छोड़ देगा राह में तू।
कभी ए राहबर सोचा नहीं था।।
प्रमोद शर्मा 'असर'
नई दिल्ली, भारत